Monday, August 31, 2009

मैं हाकी हूं ....

अभी कुछ दिन पहले राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया गया । लेकिन क्या हम लोग जानते हैं कि हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी हैं । जाहिर हैं हम में से बहुत लोग जानते होगें । और हम में से बहुत लोग नहीं जानते होगें । आईये सुनते हैं हॉकी कहानी हॉकी की जुबानी .......
मैं हाकी हूं । मुझे भारत के राष्ट्रीय खेल के नाम से पहचाना जाना जाता हैं । बाकी मैं आज अपना पहचान खो चुका हूं । मैं तो बस अब कंपटीशन में पूछे जाने वाले सवाल तक सिमट के रह गया हूं । मेरी ये हालत देखके मेरे बेटे सब की आत्मा कराह रही होगी । लेकिन आज मैं एकदम बेबस हो गया हूं । एक समय था जब ओलंपिक में मेरे बेटे ध्यान चंद और उनके भाई रूपसिंह के खेल से दुनिया भर में मेरी तूती बोलती थी । और मेरे बेटे ध्यान चंद को हॉकी का जादूगर कहा जाता था । वहीं जब मैं इतिहास का पिछिला पन्ना पलटता हूं तो देखिये ओलंपिक में छे गोल्ड मेडल जीते थे । खाली 1980 तक कुल 8 गोल्ड जीत के मेरा नाम रौशन किया था । उसके बाद मेरा स्वास्थ बिगड़ता चला गया । और अब मुझे ना तो कोई पहचानता हैं ना ही कोई जानता हैं । दुर्दशा यहां तक पहुंच गयी हैं कि देश 2008 के पेइचिंग ओलिंपिक में क्वालिफाई भी नही कर सका । दुनियाभर में हॉकी का स्वरूप बदल गया मगर मेरा हालत जस का तस बना हुआ हैं । इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन में मेरे अधिकारी सब एकदम्मे निकम्मे साबित हुआ । फील्ड में बदलाव भी मेरे हालत बिगाड़नें में कोई कसर नहीं छोड़ा । बाकी कसर हॉकी के फ्लॉप मार्केटिंग ने पूरा किया । जिससे अभी भी राष्ट्रीय खेल होने के बावजूद मेरे को स्पॉन्सर का हमेशा टोटा रहता हैं । वहीं पर मेरे दोस्त क्रिकेट मुझसे काफी आगे निकला गया । बाकी आज भी मैं अपने हालत सुधरने की बाट जोह रहा हूं । कब सुधरेगी मेरी हालत । फिर कब बहुरेगा मेरा दिन । फिर कब लौटेगा मेरा पुराना पहचान । कब फिर मैं निकलूगां किताब के पन्ना से बाहर । और दुबारा फिर से कब बजेगा मेरे नाम का डंका ।

हरजाई बिजली...

हरजाई बिजली...
मिसेज शर्मा अपना फेवरेट सीरियल नहीं देख पा रही हैं ... तो बिट्टू बाबा को वीडियो गेम खेलनें में दिक्कत हो रहा हैं ... गांव के कलावती के घर में भी अंधेरा हैं ... तो पप्पू भैया समाचार नहीं सुन पा रहें हैं ...बब्लू को अपना होमवर्क करना हैं ... नहीं तो कल स्कूल में मैडम पिटाई करेगीं ... जिससे बब्लू बाबू मोमबत्ती में ही पढ़के अपने आखं पर जोर लगा रहे हैं ... गांव के कलावती से बड़े शहर में रहनें वाली मिसेज शर्मा तक ... पप्पू भइया से लेके बब्लू तक ... सब के दुख का कारण एक ही हैं ... बिजली ... ये बिजली इतना हरजाई हो गयी हैं कि सबका मिजाज पस्त कर दिया हैं ... किसे के घर को अंधेरा कर दिया हैं ... तो किसी को सास बहू की खबर नहीं मिल पा रही हैं ... हरजाई बिजली इतना रूला रही हैं कि लोग अपने घर को छोड़ के रोड रानी के शरण में आ गए हैं ... जी हॉ हम अभी फिल्मी बिजली का बात नहीं कर रहे हैं ... हम बात कर रहे हैं देश भर में बढ़ रहे बिजली संकट के ... गौरतलब है कि पूरे देश में हरजाई बिजली अपना कहर बरपा रहीं हैं ... जिससे आम आदमी का जिन्दगी बेहाल हो गया हैं ... देश के राजधानी में दिलवाले लोगों का भी हालत पातर हो गया हैं ... तो मुंबई के पैसा वाले लोग का भी हालत किसे से बढ़िया नहीं हैं ... एक तरफ गर्मी पसीना निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहीं हैं ... तो बिजली इसको रोकने में हाथ खड़ा कर लिया हैं ... हरजाई बिजली ने सबको बेबस बना दिया हैं ... बिजली कटौती से जहां उद्योग जगत के छुक छुक गाड़ी रूक गयी हैं ... वहीं पैसा वाला लोगो का भी हालत कोई बढ़िया नहीं हैं ... हर जगह खाली एक हीं हल्ला हैं ... हरजाई बिजली कब वफा करेगी ...

Monday, August 24, 2009

माइ नेम इज नॉट खान


माइ नेम इज नॉट खान
जनाब ... आप सभी लोग को तो पता ही होगा हमारे चहेते ,देश के दुलारे शाहरूख खान ( जो अपने आपको किंग खान कहलवाना ज्यादा पंसद करते हैं ) को अभी कुछ दिन पहलें ही दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले देश में अमरीका में बुरी तरह जलील किया गया था । लेकिन इस कहानी का ये एक पहलू हैं । जो हम सभी को पता हैं । इस कहानी का दूसरा पहलू क्या हैं । ये भी कुछ प्रमुख चैनल पर प्रसारित किया गया था । यहॉ नाम लेना श्रेयस्कर नहीं हैं । कि वे कौन से चैनल हैं ।
शाहरूख मुआफ कीजिएगा किंग खान अपनें दिए जा रहें एक चैनल के फोनो पर बार बार कह रहे थे कि माइ नेम इज खान । ये उन्होनें एक बार नहीं बल्कि बार बार कहा । और इसको पूरे मीडिया के साथ साथ देशवासियों नें भी सुना । इसलिए कुछ हद तक इस बारे में फैसला आप पर छोड़ता हूं । खैर जाने दीजिए मेरे कहनें से कुछ नही होगा । आप वहीं करेंगे जो आपको मन करेगा । बहरहाल मैं यह समझ नहीं पाया कि वो क्या बोल रहें हैं । अपना नाम बता रहें हैं या फिर अपनें किसी फिल्म का प्रमोशन करे रहें हैं । थोड़ा दिमाग लगाया तो मालूम पड़ा कि .माइ नेम एज खान. किंग खान की नयी फिल्म हैं । शाहरूख भलें बम्बई फिल्म इण्डस्ट्री के मशहूर अभिनेता हो । मगर देश वासी को जो उन्होनें आजादी का तोहफा दिया वो कितना लाय़क था । मैं इस पर कोई कमेंट करना नहीं चाहता ।
हॉ इतना तो भाई कहूंगा कि जिस देश का राष्ट्रपति एक मुस्लिम हो ,जहॉ के फिल्म उद्योग में खान का बोलबाला हो । जिस देश का गाना एक मुस्लिम के गाए जाने के बाद हिट हो गया । उस देश में ये कहना हैं कि माइ नेम इज खान कितना श्रेयस्कर हैं । ये आप लोग ही अंदाजा लगा लीजिए ।
चलिए जाने दीजिए क्योकिं मेरे बगल में बैठी किंग खान की बहुत बड़ी पंखी हैं । और इस लेख को पढ़नें के बाद मेरी क्लास लगानें की तैयारी कर रहीं हैं । खैर मैं तो ये ही कहूंगा कि माइ नेम इजा नॉट खान ...
आपका अपना
दिलीप ...

Saturday, August 1, 2009

चैनल,जातिवाद और राजनीति ...



चैनल,जातिवाद और राजनीति ...
न्यूज चैनल और स्क्रीन पर न्यूज पढ़ती एंकर । जिसे देखकर अधिकतर लड़की और लड़कियां । पत्रकार बननें का सपना देखने लगती और लगता है । मेरी एक एक महिला मित्र हैं । पेशे से सरकारी नौकरी में हैं । अभी एक विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का कोर्स किया हैं । साथ में एंकर का भी कोर्स किया हैं । जो भी लोग किसी कोर्स करतें हैं उन्हें ये तो पता होगा कि प्लेसमेंट का क्या होता हैं । और इसको लेके कइसे कइसे सब्जबाग दिखाया जाता हैं । खैर जाने दीजिए फिलहाल अभी मैं अपनें महिला मित्र की बात करता हूं । अगर वो इसको पढ़ेगी तो मुझे जरूर तरह तरह के उपनाम से नवाजनें से नहीं चूकेंगीं । मैडम को लगता हैं कि एंकर बनना बहुत आसान हैं । और खालीये अपनें टैलेंट के बलबूते ही वह अपनें मुकाम तक पहुंच जाएगी । अब उसको कौन समझाये । ये कहानी केवल इस महिला की ही नहीं । परतुं हर उस शख्स की हैं जो आसमान में उड़ते हैं । कमोबेश यही हालत मेरे रूम में रहनें वाली साथीयों की भी हैं । उनकों भी ऐसा ही लगता हैं । खैर वो किसी और फील्ड के हैं । इसलिए वे क्या जानें कि हम दीवानों की क्या हालत हैं । ई हॉ आके काम करिहन त पता चली । कि का बा मीडिया ।
अगर आप अपना रोना किसे के सामनें रोएं तो वो आपको यहीं समझेगां कि आप बहुत बड़ें सीएचयूटीआईए हैं । लेकिन क्या कीजिएगा । आदमी हमेशा अपनें को काबिल और दूसरों को ऊपर लिखा हुआ समझता हैं ।
चैनल से लोगों को दिखनें वाले सपनें कितनें क्रूर होते हैं । ये तो वहीं बता सकता हैं जिसनें इसको देखा और पूरा करनें कि कोशिश की । और नहीं कर पाया । मैनें अक्सर लोगों से सुना हैं और जनाब कुछ का तो यहॉ तक कहना हैं । आपकें अंदर दम नहीं हैं । नहीं तो आप भी आज अच्छे चैनल में होतें । उनकी बात सुनकर हंसी भी आती हैं । और अपनें ऊपर ग्लानि भी होती हैं । लेकिन क्या करू कहा गया हैं कि समय बहुत बलवान होता हैं । समय ही बताएगा कि क्या क्या स्थिति हैं ।
सपना देखनें में मेरे जानकारी के मोताबिक कहीं भी रोक नहीं हैं । और बंद आखें क्या खुली आखों से भी सपना देखना चाहिए । लेकिन इसे पूरा करनें वाला ही जानता हैं कि क्या कठिन डगर हैं पनघट की । हम चैनल वाले भलें लोगों को ज्ञान बाटते फिरे लेकिन खुद कितनें ज्ञानी हैं । ये तो ई हॉ आने के बादे पता चलता हैं । दुनिया भर में फैले अंधविश्वास को आड़े हाथों लेतें है मगर खुद ही इस समस्या से कितनें ग्रसित हैं । ये किसी स्ट्रगलर से पूछिये तो बताएगा । आपस में प्रेम सौहार्द की बात करते हैं । मगर खुद कितना रखते हैं । ये यहॉ काम करनें वालों से ही जानिए तो जादे नीक रहेगा । खैर जाने दीजिए आपनें तो वह गाना सुना ही होगा कि " कुछ तो लोग कहेगें लोगों का काम हैं कहना "। वहीं दूसरी तरफ मैं आपको बता दू मैं यहॉ कि वस्तुस्थिति से अवगत कराना चाहता हूं ना कि किसी को डराना या भ्रमित करना चाहता हूं ।
अंतिम में दुष्यंत कुमार की वो पंक्ति दोहराना चाहूंगा जो नीचे हैं ....
हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,
मेरा कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ।

Wednesday, July 22, 2009

ग्रहण और मैं ...

२२ जुलाई को पूरे देश में ग्रहण आखिरकार सफलता पूर्वक हुआ। बाकी टीवी चैनलों के लिए बैठे बिठाए मुद्दा मिल गया । बात कुछ नहीं । लेकिन बनाया बवंडर । लगभग सभी चैनलों नें इसको हाथो हाथ लिया । और साथ हीं दोसरे महत्वपूर्ण खबरों को छोड़नें में कोई कोताही नहीं बरतीं । अब ये भी जगजाहिर कि लगभग सभी चैनल पथभ्रष्ट हो चुकें हैं । खैर जाने दीजिए मैं भी इस पथभ्रष्ट भीड़ का सदस्य हूं । और दूसरी तरफ अच्छे नौकरी की तलाश कर रहा हूं । अगर कहीं किसी चैनल नें इसे पढ़ लिया तो मुझे नौकरी भी नहीं देगें ।
ग्रहण की तैयारी आमजन ना भी करता मगर इसमें चैनल वालों नें कोई कमी नहीं रखी । खैर किसी तरह ग्रहण खत्म हुआ । गर्भवती महिलाओं नें भी इसकों देखा । मगर उनकों कुछ नहीं हुआ । ऐसा क्यूं हुआ इसपर चैनल वालों को जरूर पूछना चाहिए । ग्रहण के दिन यानी आज मेरे एक रिश्तेदार नें सुबह फोन किया । करीबन तड़के चार बजें । मैं गहन निंद्रा में था । बरहाल फोन उठाया गया । फोन पर उन्होनें मेरे नींद को लेके सवाल खड़े कर दिए । बात मैं ध्यान आया कि ग्रहण का भूत आनें वाला हैं । मन ही मन मैं चैनल वालों को कोस रहा था । तो दूसरी तरफ उदारीकरण के इस दौर में बढ़ रहें अंधविश्वास को झुठंला नहीं पा रहा था ।
वैसे जब मैं गांव में था तो हम लोग ग्रहण की खास तैयारी करतें थे । वों भी कुछ देसी टाइप का । जो मैं आज काफी मिस कर रहा था । पर मेरा विश्वास हैं कि आज के आधुनिकता के चक्कर में फंस कर गांव वालें भी पुरानी तैयारी को छोड़ गए होगें । और विदाई कर लिया होगा । लाइट लाइट आपको उस तैयारी के बारें जरूर बताना चाहूंगा । हम लोग एक थाल में पानी भरतें थें । उसके बाद ग्रहण होने के समय उस पानी वालें थाली में सूर्य को देखते थें । बाद में वैज्ञानिक कारण भी गांव के लोग से मालूम हुआ । अब ये बताना जरूरी नहीं हैं कि गांव में आपकों गाहे बगाहे यदा कदा हर आदमी वैज्ञानिक ही मिलेगा ।
अभी ऑफिस में बैठा हूं । और अपनें काम के साथ साथ कुछ लिखनें की भी चाहत हुई तो लिख दिया । जल्दिए आपकों और भी लेखों से रूबरू करवाउगां । फिलहाल अभी इजाजत दीजिए । प्रणाम ...

Sunday, July 12, 2009

मुझे इश्क हुआ हैं ...

हीरों--मुझे इश्क हुआ हैं
उसका दोस्त -- किससे
हीरों-- लड़की से और क्या
आज टीवी पर एक फिल्म आ रही थी जिसका रसास्वादन मैं अकेले कर रहा था । वहीं दूसरी तरफ न्यूज चैनल सब इस समय गे मुद्दे पर खेल रहें थे । ऊपर लिखी गई शुरूआती डॉयलाग के बाद जब मैनें खबरिया चैनलों के तापमान को जानना चाहा तो ये दृश्य देखा । कुछ देर सोचता रहा । लेकिन फिर सब कुछ शीशे की तरह साफ हो गया ।
कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के बाद जहॉ एक तरफ मॉ बाप की चिंता बढ़ गई हैं । वहीं दूसरी तरफ शब्दों के ठीक से इस्तमाल करने की भी चिंता बढ़ गई हैं । जी हॉ ऊपर निकाले गये फिल्मी डॉयलाग कुछ ही बातों की तरफ इशारा करता हैं । जाने अन्जाने में सही ऊपर फिल्माए गए डॉयलाग में समलैंगिकता की झलक मिलती हैं । बरहाल आज से कुछ समय पहले भले इन दो अर्थों वाली संवाद पर मुहं झेप लिया जाता हो पर अब ये धारणा बिल्कुल उलट गयी हैं । जिसका नतीजा आप दोस्ताना के रूप में देख चुके हैं । वैसे दोस्ताना की शुरूआत बहुत पहिले हो गयी हैं । लेकिन जिस तरह से आज लोग बोल्ड हो गए है । वो भविष्य में होने वाले हमारे समाज के बदलाव का सूचक हैं । ये बदलाव समाज को फायदा पहुंचाएगा ये तो आने वाले समय में हीं पता चलेगा । वहीं इसका नुकसान भी समय के साथ ही पता चलेगा । लेकिन इतना तो है कि बैठे बिठाए कम से कम खबरिया चैनलों वालों को मुद्दा मिल गया हैं । खैर अपनों को क्या हैं हम तो जैसे थे वैसे ही रहेगें । वैसे बदलाव ही प्रकृति का नियम हैं । और हमें इस बदलाव को स्वीकार करना होगा ।

Saturday, July 11, 2009

२४*७ का माया

आज से कुछ साल पहलें तक लोग शाम के बाद निकलना पंसद नहीं करतें थे । वहीं लोग आज कल देर रात रोड पर घूमते देखे जा सकतें हैं । जो लोग रात में जगना पंसद नही करते थे । वे आज की तारीख में रात की शिफ्ट करते नजर आ रहें हैं । जिस शहर में शाम होनें की आहट मात्र से बहू बेटियों का घर से बाहर निकलना वर्जित था । उसी शहर में वहीं बहू बेटी रात में नौकरी करती दिखाई दे रही हैं । कुल मिलाकर अगर हम ये कहें कि ये २४*७ की माया हैं तो अतिशोयक्ति नहीं होगी ।
ये २४*७ के कल्चर की शुरूआत देश में कॉल सेंटर के उदघोष के बाद हुई । ज्ञात हो कि अमूमन कॉल २४ गुणे ७ के फंडे पर काम करते हैं । कॉल सेंटर के बाद बारी थी मॉल कल्चर की । जिसके आने के बाद देश का कल्चर एकदम ही बदलता हुआ नजर आया । अभी अगर हम एक सरसरी नजर मैट्रो शहर के लाइफ स्टाइल पर गौर फरमाए तो देखेंगे कि २४*७ का कल्चर कितना हावी हो चुका हैं ।
इसी तरह कमोबेश मीडिया का हाल हैं । टाइम पास करने का ये कल्चर मीडिया में बुरी तरह हावी हैं । जिसका नतीजा यह है कि तमाम लोग जो इस कल्चर में फंसे हैं वो किसी ना किसी रूप से परेशान हैं और जिंदगी से त्रस्त भी ।
औरों की तरह मैं भी इस कल्चर में जी रहा हूं । और लाइट लाइट का मजा ले रहा हूं । जिसका नतीजा ये हैं कि सुबह चार बजे के समय ब्लाग ब्लाग खेल रहा हूं । खैर चलिए जाने दीजिए जिंदगी में जो लिखा है वहीं होगा । सुबह के चार से अधिक हो गया है । अउर ब्रहममूहुर्त शुरू हो गया है ।
आप सभ को इस अदने से पत्रकार का सुप्रभात । प्रणाम ...

टी.वी चैनलों का उमडता गे प्रेम...

२ जुलाई का दिन दिल्ली हाई कोर्ट का वह आदेश पूरा मीडिया जगत के शब्दों में कहें तो खेलनें वाला मु्द्दा दे गया । जी हॉ हम बात कर रहें हैं हाई कोर्ट के उस आदेश का जिसमें देश में अपनें मर्जी से समलैगिंक संबंध को मंजूरी दे दी गयी थी । ठीक हॉ भाई समलैंगिको मंजूरी मिली। उनको राहत मिला । पर उनका क्या जिनका चैन हराम हो गया । आखिर जो गे नहीं उनकी तो शामत आ गई । इधर चैनल वालों को ऐसा मसाला मिल गया जिसकों कोई भी चैनल नें छोड़ना उमदा नहीं समझा । उधर इस चक्कर और दूसरें मुद्दे जरूर छूट गए । खैर एक बात तो हैं हाई कोर्ट के इस आदेश नें देश में एक बार फिर इस बात पर बहस छेड़ दी हैं कि क्या हम आधुनिकता के चक्कर में अपनी सभ्यता को भूलते जा रहें हैं । बरहाल अगर हम इतिहास के पन्नें को कुरेदतें हैं तो पाएगें कि महाभारत काल से हीं समलैंगिक संबध रहें हैं । मुआफ कीजिएगा पर मेरे सामान्य ज्ञान के मुताबिक शिखंडी भी गे थे । यहॉ तक कि वनवास के दौरान अर्जुन को भी महिला का रूप धारण करना पड़ा था । उस जमाने के मुताबिक वे भलें ही समलैंगिक ना हो पर आज के जमाने के मुताबिक उन्हें भी गे के श्रेणी में लाके खड़ा कर दिया हैं । वैसे हमें किसी महान व्यक्ति के नाम को छोड़कर मुद्दे पर वापस लौंटना चाहिए । अन्यथा वैसे भी अभीं मुद्दों की सक्त कमी हैं । हैं तो हम बात कर रहें थे टीवी पर समलैंगिकों पर दिखाए जा रहें कार्यक्रम के बारें में । ऐसा लगता हैं कि इन टीवी चैनलों नें लोगों को गे बनानें का ठेका ले लिया हैं । जब टीवी को ट्यून कीजिए किसी ना किसी चैनल पर गे बिकतें नजर आ जाएगें । वैसे में भी टीवी का पत्रकार हूं । पर क्या करू । और बड़ी बात कि मैं कर भी क्या सकता हूं सिवाय जो हो रहा हैं उसमें शरीक होके गर्दन हिलानें के अलावा । खैर जहॉ कोर्ट के इस फैसलें के पक्ष काफी सारे गे लोगों में खुशी की लहर दौड़ गयी हैं वहीं इसकें खिलाफ काफी लोग लामबंध हो गए हैं । वहीं सुप्रीम कोर्ट नें भी सरकार को नोटिस जारी किया हैं । जिससें लोगों की आशा बढ़ी हैं । ये तो आनें वाले समय में हीं पता चलेंगा कि क्या होता हैं । बाकी न्यूज चैनल वालों को बैठे बिठाए खेलनें के लिए अच्छा मुद्दा दे दिया हैं ।

Friday, July 10, 2009

मॉ भैया...भैया ले आए

घर की घंटी बजी साथ साथ बहुत लोगों की । अंदर से गुड्डी दौड़ती हुई झट से दरवाजा खोली । बाहर खड़े भैया ने गुड्डी से कहा गुड्डी ये तुम्हारी भाभी हैं । गुड्डी के चेहरें पर खुशी के जगह बारह बज गए और वह फिर दोबारा जितनी तेजी से दौड़ती हुई आयी थी उतनी तेजी से वापस दौड़ती हुई मॉ के पास गयी । और मॉ से बोली मॉ भैया ... आपके लिए भैया लेके आए हैं । मॉ को कुछ समझ में नहीं आया । और वह बोली क्या बकती हैं कहती हूं टीवी कम देखा कर । तब तक भैया नये भैया के साथ घर में आ चुके थे । अंदर आकर भैया बोले मॉ ये तुम्हारी बहू हैं । अब बारी थी मॉ की । दरवाजे के घंटी की मॉ की भी घंटी बज गईं ।
जी हॉ भलें ये कहानी काल्पनिक हो । पर आनें वाले समय में ऐसा होने से इंकार नहीं किया जा सकता । वो दिन दूर नहीं जब भैया मूछ वाली भाभी लेके आए । कम से कम कोर्ट से मिलें मंजूरी के बाद तो इसके पॉजिटिव संकेत मिलते हैं । हाल में कोर्ट से मंजूरी मिलनें के बाद समलैंगिकों के हौसलें जिस तरह से मस्त हो रहें हैं उससे यहीं लगता हैं कि आनें वाले दिन में मॉ बाबूजी के हौसलें पस्त होगें । और उनके आशा पर किस तर ह पानी फिरेगा । गौरतलब हैं कि हाल में ही कोर्ट नें समलैगिंक संबंध को वैध करार दिया था । और दोनों पक्ष में आपसी रजामंदी के बाद हुई शादी को भी जायज ठहराया था । जिसके बाद देश के दर्जनों मॉ बाप के ऑखों से नींद गायब होना लाजिमी हैं ।
वैसे जहॉ तक हमारे यानी मेरे ज्ञान का संबंध हैं इसका उल्लेख काफी पुरानें ग्रथों में मिलता हैं । हालाकिं इस बात को हम यही पर छोड़ना पंसद करेंगें । क्योकिं एक तो ये पहलें से विवादित हैं ऊपर से आजकल बैसे भी मुद्दों की सख्त कमी हैं । वैसे पश्चिमी देशों में इस कुप्रथा का प्रचलन काफी दिनों से हैं । पर हमार भारत में ये नदारद तो नहीं कहेंगें पर खुलेआम नहीं होता था । जो अब होना शुरू होगा । खैर छोड़िए भी आखिर मैं आपकों कब तक अपनें बोरिंग लेखनी से चाटता रहूंगा । वैसे भी इस मामलें में मेरी मर्जी हैं । झेलना आपकों है । झेलना हैं तो झेलिए नहीं तो कोई और ब्लाग के तरफ रूख कीजिए ।
बाकी अंत में एक चीज जरूर कहूंगा अबहीं अगर छोटी अवधि के लिए देखा जाए तो इसका बहुत फायदा हैं । सबसे पहिले कि आबादी नहीं बढेगी। जितना भी बुआई कीजिए फसल उतना ही रहेंगा । दुसरा फायदा ये कि शादी बियाह का खर्च कम हो जाएगा ।
लेकिन इसकों अपनाने से पहिले ये सोचना होगा कि मॉ बाप के सपनें को क्या हम ऐसे ही अपनें स्वार्थ के चलते कुचलतें रहेंगें । क्या हम प्रकृति से ऐसे ही पंगा लेते रहेंगें और हम सबकी प्यारी दुलारी धरती को सर्वनाश के तरफ ले जाएगें । अगर हमारा जवाब हैं तो फिर तो दीवाल में अपना माथा अपनें से मारनें वाली बात हो गयी । अगर जवाब नहीं हैं तो फिर हमें इसकें खिलाफ एकजुट होना चाहिए और इसका मुकाबला हमलावर तरीके से करना चाहिए ।
अभी मेरे दलान से बस इतना हीं क्योकिं सुबह के साढ़ें तीन बज गए हैं और मुझे काम करना हैं ।

Thursday, July 9, 2009

मैं और मेरी तन्हाई...

मैं और मेरी तन्हाई .... सिलसिला के इस सिलसिला चला वो आज भी थमनें का नाम नहीं ले रहा हैं ... जी हॉ आज भी लड़के अपनें प्रति सहानुभूति वोट लेनें के इस डायलाग से बे इन्तहा प्यार करते हैं ... मुआफ कीजिएगा आप भले ही गलत मान रहे हो और मेरी बात पर विश्वास नही कर रहें हो ... लेकिन हम हरामखोरों को ये भली भागिं आता हैं ... गॉव का चमरटोली हो या फिर बभनटोली ये संवाद दोनों टोली में कोई भेदभाव नही करता हैं .. और ना हीं ईस टोली में रहनें वाले लोग ... मेरे एक मित्र जो मेरे इस कॉलर ट्यून लगाने पर मुझनें बड़े चिढ़ते हैं ,उन्होनें मुझे रात के दो बजे फोन किया । आम आदमी को भलें ही आज दो बजे फोन करे तो आप गालियों से सुसज्जित होगें । लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं । अरे भाई मैं निशाचर हू यानी रात में जगनें वाला । क्योकि गाहे बगाहें ही सही मैं एक ऐसे पेशे में हूं जिसमें रहनें वालों को दल्ला के नाम से जाना जाता हैं । अरे भाई लगता हैं कि आप फिर गलत समझ गयें । आखिर समझे भी क्यों ही हमारे देश में जो चलन हैं उसमें लोग गतल चीज पहिलें सोचतें हैं और नीक चीज बाद में । बेशी क्या हूं पर ये सच नहीं तो झूठ भी नहीं हैं । हॉ तो हम बात कर रहें थे मैं और मेरी तन्हाई का । वैसें ये तन्हाई मेरी ही नहीं आपकी या यू कहें कि किसी कि भी हो सकती हैं । हॉ तो उस बंधु का आखिरकार फोन आया । और दिनों की तरह वे मुझे गाली दे कर नहीं बल्कि बहुत प्यार से बात किया । मेरी कुछ समझ मैं नहीं आया । क्योकि शुरू से ही मोटी बुद्धि हॉ भाई । इतनी जल्दिए थोडीयें ना आयेगा । बरहाल मुझे उस सज्जन नें मेरे कॉलर ट्यून पर पहली बार तारीफ की । और बोला भाई मुझे भी ये कॉलर लगावा दो । अचानक आई बदलाव से मैं सहम गया । और बदलाव वो भी रात के दो बजे । हम बिल्किल अक्का बक्का रह गए । पर कर भी क्या सकतें थे । खैर मैनें उनकी परेशानी को सॉल्व कर दिया । पर आज तक ये बात मेरे समझ नहीं आई आखिर वो तन्हाई क्या थी और क्यों थी ।